मंगलवार, 2 जुलाई 2013
प्रकृति का तांडव
अब देखो प्रकृति का तांडव....प्रकृति हमसे बातें
करना चाहती है. वह हमें दुलारना चाहती है, अपनी गोद में खिलाना चाहती है.
उसने हमें क्या नहीं दिया, वर्षों से वह हमारी सेवा कर रही है, लेकिन हमने
उसे क्या दिया?उत्तराखंड में प्रकृति की भीषण त्रासदी
ने क्षेत्र का जनजीवन बुरी तरह से तबाह कर दिया है. मौतों का कोई आंकड़ा
तो अभी सामने नहीं आ पाया है लेकिन इस आपदा में जान गंवाने वालों की
संख्या का अनुमान हज़ारों में लगाया जा रहा है. न जाने कितने लोग अपनों को
खोकर अपना सब कुछ गंवा बैठे हैं. न सिर्फ लोगों के सर से छत उठ गयी है
बल्कि आज उनको खाने-पीने के भी लाले पड़े हुए हैं.आधुनिकता और विकास के नाम
पर प्रकृति के साथ खिलवाड किया... जंगलों को काटा .. नदियों को प्रदूषित
किया.. बांध बनाकर उनकी अविरल धारा को रोकने की चेष्टा की... हमेशा प्रकृति
के साथ अधोषित युद्ध किया...चार दिन की इस गुस्सैल बारिश ने कम से कम यह
तो बता ही दिया है कि प्रकृति और पर्यावरण से छेड़छाड़ करोगे, तो कहीं के
नहीं रहोगे। प्रकृति के प्रकोप का ऐसा मंजर मैने जीवन में नहीं देखा
था..चूंकि अब स्थितियां बदल चुकी हैं, प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार और
बदले में प्रकृति की चाल भी बिगड़ चुकी है, उत्तरकाशी में तीन साल पहले आई
कुदरती आपदा के जख्म और निशान अभी तक बाकी हैं, सरकारी तंत्र आज तक उन
ठिकानों को दुरुस्त नहीं कर पाया है। प्रकृति का प्रकोप नए-नए रास्ते बना
रहा है, लेकिन उससे निपटने का हमारा तंत्र दिन-प्रतिदिन सुन्न होता जा रहा
है।यों तो उत्तराखंड के लगभग हर इलाके में बरसात का कहर बरपा है, मानसून की
शुरुआत में ही बारिश ने उत्तराखंड में जो तबाही मचाई उसे देखकर पूरी
दुनिया स्तब्ध रह गई है। ।उत्तराखंड के अधिकतर इलाकों में बिजली परियोजनाएं
चल रही हैं। यही नहीं प्राकृतिक संसाधन से राज्य का विकास करने के अंधे
लालच में इस पहाड़ी प्रदेश में अंधाधुंध खनन चल रहा है। दुर्भाग्य से
अधिकतर खनन का काम बाहरी ठेकेदार चला रहे हैं जिन्हें पहाड़ों की प्रकृति
का कुछ भी पता नहीं। अब तो प्रकृति के साथ खिलवाड बंद करो .पहाड़ों में वन
क्षेत्र भी कम हुआ है, जिसकी वजह से भू-स्खलन होता आया है। अवैध खनन ने भी
पहाड़ों के भौगौलिक आधार को प्रभावित किया है। पर्यावरण और विकास के बीच एक
संतुलन जरूर बिठाया जाना चाहिए, ताकि प्रकृति को रौद्र रूप धारण न करना
पड़े। पहाड़ों में इस तरह के विनाश से न केवल विकास का पहिया रुकता है,
विकास के नाम पर की गई तरक्की काफी पिछड़ जाती है।.राज्य में प्राकृतिक
आपदा के कहर, भारी वर्षा, बादल फटने व भूस्खलन एवं बाढ़ से जनजीवन बुरी तरह
तबाह हो चुका है.
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